ऑफ़लाइन

डिजिटल डिटॉक्स अनुभव की शुरुआत शांति से नहीं, बेचैनी से हुई। फोन उठाने की आदत और अचानक आई खामोशी साफ़ महसूस हुई।

आदत

आज हम हर छोटी असहजता को स्क्रीन से ढक देते हैं। ऑफ़लाइन रहना दिखाता है कि स्क्रॉल करना कब आदत बन गया।

हमेशा जुड़े

हर समय अपडेट और उपलब्ध रहना सामान्य लगता है, लेकिन यही लगातार तनाव भी पैदा करता है।

बेचैनी

बिना नोटिफिकेशन के इंतज़ार, चुप्पी और खाली समय ज़्यादा महसूस होने लगे।

ध्यान

कुछ दिनों बाद ध्यान लौटने लगा। पढ़ना, बात करना और सोचना पहले से आसान हो गया।

भावनाएँ

बिना डिजिटल शोर के हल्की उदासी, शांति और आत्मचिंतन साफ़ दिखने लगे।

धीमापन

नींद बेहतर हुई, शरीर हल्का लगा, और दिमाग़ हर समय सतर्क नहीं रहा।

सामूहिक

यह अनुभव सिर्फ़ एक व्यक्ति का नहीं। दुनिया भर में लोग स्क्रीन थकान से जूझ रहे हैं।

जागरूकता

सबसे बड़ा बदलाव यह समझना था कि कब स्क्रॉल करना आराम की जगह ले लेता है।

वापसी

डिजिटल डिटॉक्स भागना नहीं है। यह होश के साथ ऑनलाइन लौटने का तरीका है।

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