जब आस्था घातक बन जाए
अचानक
एक सामान्य पल। एक खामोश मोड़। ज़िंदगी बिना चेतावनी के खत्म हो जाती है। यह कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ ज़्यादातर लोग स्क्रॉल रोक देते हैं।
अनदेखी
धार्मिक हिंसा अक्सर शोर नहीं मचाती। यह रोज़मर्रा की आदतों और मोहल्लों में छिपी रहती है, जब तक नुकसान साफ़ न दिखने लगे।
पहचान
आस्था परिवार, रिश्तों और फैसलों को आकार देती है। जब वही पहचान खतरा बन जाए, तो सामान्य ज़िंदगी भी असुरक्षित लगने लगती है।
निशाना
हिंसा व्यक्ति को नहीं, प्रतीक को चुनती है। इसी तरह आम लोग अचानक किसी बड़े डर का चेहरा बना दिए जाते हैं।
टूटन
एक घटना पूरे समुदाय को तोड़ देती है। भरोसा घटता है। बातचीत बदल जाती है। बच्चे समय से पहले डर सीख लेते हैं।
खामोशी
हिंसा के बाद खामोशी फैलती है। लोग नज़रें चुराने लगते हैं। सवाल दब जाते हैं। डर तय करता है कि कब चुप रहना है।
आदत
सबसे बड़ा खतरा तब आता है जब झटका सामान्य लगने लगे। जब ऐसी कहानियाँ रोज़मर्रा की खबर बन जाती हैं।
प्रभाव
डर सीमाओं में नहीं रहता। यह रिश्तों, भविष्य और फैसलों को बदल देता है। प्रभावित न होने वाले लोग भी सिमटने लगते हैं।
चुनाव
हर समाज के सामने एक विकल्प होता है। अनदेखा करना या सामना करना। नज़रें फेरने की कीमत हमेशा बाद में चुकानी पड़ती है।
याद
यह सिर्फ एक कहानी नहीं है। यह चेतावनी है कि सह-अस्तित्व कितना नाज़ुक है। आज की चुप्पी कल की दिशा तय करती है।
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